रीढ़ की हड्डी में चोट लगना

रीढ़ की हड्डी में चोट लगने (SCI) में मेरूदंड में शामिल तंतुओं को नुकसान होना भी शामिल है, रीढ़ की हड्डी में अधिकतर चोटें कशेरूका कॉलम को लगे आघात के कारण होती हैं जिससे मस्तिष्क से शारीरिक प्रणाली तक संदेशों के आदान प्रदान की रीढ़ की हड्डी की दक्षता प्रभावित होती है। उक्त प्रणाली संवेदक, चोट से पहले स्तर तक, मोटर एवं ऑटोनामिक गतिविधियों का संचालन करती हैं।

रीढ़ की हड्डी एवं मस्तिष्क, दोनों मिलकर केंद्रीय तंत्रिका तंतु (CNS) का निर्माण करते हैं। रीढ़ की हड्डी शरीर की गतिविधियों एवं संवेदनाओं का समन्वय करती है।

रीढ़ की हड्डी में न्यूरोंस तथा एक लंबी तंत्रिका अक्ष तंतु होती है। रीढ़ की हड्डी के अक्ष तंतु मस्तिष्क से नीचे की ओर (अवरोही क्रम में) तथा ऊपरी मस्तिष्क की ओर (आरोही क्रम में) लेकर जाते हैं। इन मार्ग में अनेक अक्ष तंतु मायलिन के नाम से जाने जाने वाले इंस्यूलेटिंग तत्व से कवर होते हैं । ये तत्व उन्हें सफेद आवरण प्रदान करता है, यही कारण है कि जिस क्षेत्र में वे पाए जाते हैं उसे व्हाईट मैटर कहा जाता है।

तंत्रिका कोशिका स्वयं भी, अपनी पेड़ जैसी शाखाओं जिसे द्रुमाश्म कहा जाता है अन्य तंतु कोशिकाओं से संकेत ग्रहण करती हैं। ये मिलकर ग्रे मैटर का निर्माण करती हैं। यह ग्रे मैटर रीढ़ की हड्डी के केंद्र में स्थित तितलीनुमा क्षेत्र में रहता है।

मस्तिष्क की तरह ही, रीढ़ की हड्डी में भी तीन भाग या मेंबरेंस (पर्दे) होते हैं : पिया मेटर, आंतरिक परत एवं आरकोनाइड, एक मध्यम परत तथा ड्यूरा मैटर जो कि कठोर बाह्य परत है।

रीढ़ की हड्डी का गठन इसकी लंबाई के साथ खंडों में होता है। प्रत्येक खंड से तंत्रिकाएं शरीर के भाग विशेष से जुड़ी होती हैं। गर्दन या ग्रीवा क्षेत्र के खंडों को सी 1 से सी 8 के रूप में जाना जाता है और यह गर्दन, बांहों एवं हाथों को संकेतों का नियंत्रण करते हैं।

थोरैसिस या पीठ के ऊपरी हिस्से (टी1 से टी12) की तंत्रिकाएं धड़ एवं बांहों के कुछ हिस्सों को संकेत देती हैं। लंबर या रिब्स के ठीक नीचे मध्य पीटी क्षेत्र (एल1 से एल5) की तंत्रिकाएं नितंब तथा पैरों के संकेतों का नियंत्रण करती हैं।

और अंत में सेकर खंड (एस1 से एस5) जो लंबर खंडों के ठीक नीचे मध्य पीठ में स्थित होते हैं, ग्रोईन, टोईस तथा पैरों के कुछ हिस्सों को संकेतों का नियंत्रण करते हैं। मैरू के साथ साथ विभिन्न खंडों में रीढ़ की हड्डी चोट के प्रभावों से यह संगठन परीलक्षित होता है।

रीढ़ की हड्डी का परिचालन अनेक तरह की कोशिकाएं करती हैं। बड़ी मोटर तंत्रिका कोशिका में लंबे अक्ष तंतु होते हैं जो गर्दन, धड़ तथा लिंबस में स्केलेटल मांसपेशियों का नियंत्रण करते हैं। संवेदनशील तंत्रिका कोशिका को डोरसल रूट गैंगलियन कहा जाता है जो रीढ़ की हड्डी के ठीक बाहर मिलते हैं। इन संवेदक तंत्रिका कोशिकाओं की तंत्रिकाएं रीढ़ की हड्डी से सूचनाएं शरीर में ले जाती हैं। मैरूदंड अंतरातंत्रिकाणु, जो पूरी तरह से रीढ़ की हड्डी के भीतर स्थित होते हैं, संवेदक सूचनाओं के एकीकरण तथा समन्वित संकेत पैदा करने में मदद करते हैं। इन संकेतों से मांसपेशियों का नियंत्रण होता है।

ग्लिया या समर्थक कोशिकाएं, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में बहुसंख्या में होती हैं और अनेक आवश्यक गतिविधियों को निपटाती हैं। एक तरह की गल कोशिका जिसे आले कहते हैं, मइलिन का निर्माण करती है जो अक्ष तंतु को इंस्यूलेट करती है और तंतु संकेत के ट्रांसमिशन की विश्वसनीयता तथा गति को बढ़ाती है। एक अन्य ग्लिया, रीढ़ की हड्डी के निकट स्थित होती है जैसे कि व्हील के निकट रिम एवं स्पोक्स, यह आरोही एवं अवरोही नर्व फाइबर ट्रेक के लिये जगह मुहैया कराती है।

एस्ट्रोसाइट्स, ये बड़ी सितारे की आकृति की ग्लियन कोशिकाएं होती हैं जो तंतु कोशिकाओं के चारों ओर के द्रव के निर्माण का नियमन करती हैं। छोटी कोशिकाओं को माइक्रोग्लिया कहा जाता है, ये भी चोट के समय सक्रिय हो जाती हैं और बेकार उत्पादों का साफ करने में मदद करती हैं। ये सभी ग्लियन कोशिकाएं तत्वों का उत्पादन करती हैं जो न्यूरान सर्वाइवल का समर्थन करती हैं और अक्ष तंतु के विकास को प्रभावित करती हैं। हालांकि, ये चोट के बाद सुधार में बाधक भी हो सकती हैं।

चोट के बाद, बाह्य तंत्रिका तंतु (पीएनएस) की तंतु कोशिकाएं, या न्यूरोंस, जो लिंब, धड़ तथा शरीर के अन्य भागों को संकेत ले जाती हैं, खुद की मरम्मत में सक्षम होती हैं। हालांकि सीएनसी में चोट लगे तंतु पुन: पैदा होने में सक्षम नहीं होते हैं।

मस्तिष्क एवं रीढ़ की हड्डी की तंतु कोशिकाएं आघात का प्रत्युत्तर देती हैं और इनको पीएनएस की कोशिकाओं सहित शरीर की अधिकतर अन्य कोशिकाओं की तुलना में अलग तरह से नुकसान होता है। मस्तिष्क तथा रीढ़ की हड्डी इस तरह के हड्डियों वाले घेरे में बने होते हैं जो उनकी सुरक्षा करता है, लेकिन यह उन्हें सूजन या जबरदस्त चोट से होने वाली दबावीय नुकसान के लिये अतिसंवेदनशील होता है। सीएनएस की कोशिकाओं में उपापचय (मेटाबोलिज़्म) की दर काफी अधिक होती है और ऊर्जा के लिये रूधिर ग्लूकोज पर निर्भर करती है- इन कोशिकाओं को स्वस्थ कार्य-संचालन के लिये समुचित मात्रा में रक्त आपूर्ति की आवश्यकता होती है। सीएनएस कोशिकाएं विशेषकर रक्त प्रवाह में कमी (इस्कीमिया) के लिये संवेदनशील होती हैं।

सीएनएस का अन्य अनूठा फीचर 'रक्त-मस्तिष्क-अवरोध' एवं 'रक्त-रीढ़ की हड्डी-अवरोध' होता है। ये अवरोध कोशिकाओं द्वारा सीएनएस में रक्त वाहिकाओं से बनते हैं। ये तंत्रिका तंतु में संभावित हानिकारक तत्वों के प्रवेश से बचाते हैं, साथ ही इम्यून प्रणाली की कोशिकाओं को भी। मानसिक आघात के कारण ये अवरोध पैदा सकते हैं, संभावित रूप से मस्तिष्क एवं रीढ़ की हड्डी में और नुकसान में योगदान करने के लिये। रक्त-रीढ़ की हड्डी के अवरोध कुछ संभावित उपचार करने वाली दवाओं के प्रवेश को भी रोकता है।

अंतत:, मस्तिष्क एवं रीढ़ की हड्डी में ग्लिया तथा एक्स्ट्रासेल्यूलर मैटरिक्स (कोशिकाओं के चारों ओर का पदार्थ) उससे अलग होता है जो बाह्य तंतुओं में होता है। पीएनएस तथा सीएनएस में ये सब भिन्नताएं चोट के प्रति उनके अलग-अलग प्रत्युत्तरों में योगदान करती हैं।

पूर्ण एवं अपूर्ण

किसी 'पूर्ण चोट' एवं 'अपूर्ण चोट' में क्या अंतर है? जिस व्यक्ति को अपूर्ण चोट लगती है उसे चोट से नीचे के स्तर में कुछ स्पेयरड संवेदक या मोटर गतिविधियां होती हैं- इसमें रीढ़ की हड्डी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त या बाधित नहीं होती है। पूर्ण चोट में, नस या तंत्रिका में लगी चोट मस्तिष्क से आने वाले और चोट से नीचे के शरीर के अंगों को जाने वाले हर संकेत को बाधित करती है।

किसी भी रीढ़ की हड्डी की चोट के बाद गतिविधियों या संचालन में सुधार की उम्मीद हमेशा रहती है, और आमतौर पर यह सच्चाई है कि अपूर्ण चोट लगे व्यक्ति के फिर से सामान्य होने के अवसर ज्यादा रहते हैं।

कोलोराडो में सभी नई रीढ़ की हड्डी की चोटों का एक व्यापक अध्ययन क्रेग हास्पिटल ने किया है। इसमें कहा गया है कि चोट के तुरंत बाद पूरी तरह से लकवाग्रस्त होने के सात में से एक मामले में ही बाद में कामकाज या गतिविधियां सामान्य हो पाती हैं। लेकिन उन मामलों में जहां चोट के तुरंत बाद पैरों में कुछ गतिविधि होती है, के मामलों में चार में से तीन में उल्लेखनीय सुधार नजर आया है।

गर्दन पर चोट के मामलों में लगभग 2/3 अपने पैरों में पिन के चुभने जैसा तीखापन महसूस कर सकते हैं और बाद में चलने लायक ताकत वापस पा लेते हैं। गर्दन पर चोट लगने की स्थिति में, हल्के से स्पर्श को महसूस कर सकने वालों में, आठ में से एक बाद में चल सकते हैं।

जितनी जल्दी ही मांसपेशियां फिर से काम करना शुरू करेंगी, अतिरिक्त सुधार के उतने ही अधिक अवसर होंगे। लेकिन जब मांसपेशियां देरी से काम करने पर लौटती हैं - पहले कुछ सप्ताह के बाद - वे पैरों के बजाय हाथों में अधिक होंगी।

जब तक मांसपेशियों में अतिरिक्त गतिविधियां तथा कुछ सुधार होता है तो इस बात की संभावना अधिक रहती है कि और अधिक सुधार संभव है।

सुधार में जितनी अधिक देरी होगी, व्यापक सुधार की संभावना भी उतनी ही कम होगी।

आंकडे़

अमेरिका में लगभग 4,50,000 लोगों को सतत अभिघातीय रीढ़ की हड्डी की चोटें लगी होती हैं और अमेरिका में हर साल रीढ़ की हड्डी की चोटों के 10,000 नये मामले सामने आ रहे हैं। रीढ़ की हड्डी की चोटों के सभी मामलों में पुरूषों का हिस्सा 82 प्रतिशत तथा महिलाओं का प्रतिशत 18 है।

प्राय: मोटर वाहन दुर्घटनाओं में रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाती है। यही सबसे बड़ा एवं सामान्य कारण है। इसके अलावा कहीं से गिरने या हिंसक गतिविधियों में रीढ़ की हड्डी की चोट लगना बहुत आम बात है। बच्चों तथा किशोरों में प्राय: खेलकूद गतिविधियों के कारण रीढ़ की हड्डी में चोट लगती है। वहीं वयस्कों (विशेषकर निर्माण कार्यों में) कार्य संबंधी चोटों की बहुतायत होती है।

रीढ़ की हड्डी की चोट के अधिकतर रोगी किशोर या नौजवान होते हैं। इनमें लगभग 80 प्रतिशत पुरूष होते हैं। पुरूषों का यह आधिक्य 65 साल की आयु के बाद कम होता है। उक्त आयु में गिरने से रीढ़ की हड्डी की चोट लगने की घटनाएं आम होती हैं। आधे से अधिक रीढ़ की हड्डी की चोट, ग्रीवा क्षेत्र में लगती हैं, गर्दन में। एक तिहाई चोटें छाती के क्षेत्र में लगती हैं जहां पसलियां, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी होती हैं। शेष चोटें लंबर क्षेत्र में होती हैं जैसे कि पीठ के निचले हिस्से में।

फिलहाल, रीढ़ की हड्डी की चोटों के लिए कोई इलाज नहीं है। हालांकि, शल्यक्रिया एवं दवा चिकित्सकीय क्षेत्र के मौजूदा अनुसंधान तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। रीढ़ की हड्डी की चोटों के प्रभावों से उभरने के लिये चोट के विस्तार को रोकने वाली दवा चिकित्सा, डिकंपरेशन शल्य क्रिया, तंत्रिका कोशिका ट्रांसप्लाटेशन, तंत्रिका पुन:उत्पादन तथा जटिल दवा चिकित्सा सहित सभी तरीकों पर परीक्षण किया जा रहा है।

स्रोत : अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ़ न्यूरोसर्जिकल सर्जन्स, क्रेग हास्पिटल, क्रिस्टोफर तथा डैना रीव फाउंडेशन, द नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूरोलाजिक्ल डिसआर्डर्स एंड स्ट्रोक

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