मूत्राशय प्रबंधन / Bladder Management

किसी भी स्थिति में पक्षाघात या लकवा, मूत्राशय एवं आंत के कामकाज को हमेशा ही प्रभावित करता है। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि इन आंतरिक अंगों को नियंत्रित करने वाली नसें मेरूरज्जु के मूल आधार (स्तर एस2-4) से जुड़ी होती हैं और इस तरह से मस्तिष्क से मिलने वाली सूचनाओं से कट जाती हैं।हालांकि लकवे से पहले के नियंत्रण स्तर को पुन: पा लेना संभव नहीं होता लेकिन मूत्राशय तथा आंत के कामकाज का प्रबंधन करने के लिये व्यापक तकनीकें और उपकरण मौजूद हैं।

कैसे काम करता है मूत्राशय :

मूत्र में जल की अतिरिक्त मात्रा तथा नमक होता है जिसे गुर्दा रक्तधारा से अलग करता है। गुर्दो से मूत्र को पतली नलिकाओं में भेजा जाता है जिन्हें मूत्रवाहिनी कहा जाता है। इनमें सामान्यत: मूत्र को एक हीदिशा में प्रवाहित होने की अनुमति दी जाती है। मूत्रवाहिनी का संबंध मूत्राशय से होता है जो मूलत: एक मजबूत थैली होती है। जब मूत्राशय भर जाता है तो, नसें मेरूरज्जु के माध्यम से मस्तिष्क को संदेश भेजती हैं।

जब कोई मूत्र त्याग को तैयार होता है तो मस्तिष्क एक लौटता संदेश मेरूरज्जु के माध्यम से मूत्राशय को भेजता है जिसमें मूत्राशय की दीवार यानी डेटरुसर मसल को संकुचन तथा स्फिंकटर मसल को आराम की स्थिति में आते हुए खुलने के लिये कहा जाता है। स्फिंकटर मसल मूत्रमार्ग यानी यूरेथ्रा के शीर्ष के आसपास एक वाल्व होता है। यानी पेशाब करने की प्रक्रिया भी मांसपेशियों के समन्वय की प्रक्रिया है।

लकवाग्रस्त होने की स्थिति में मूत्राशय को नियंत्रित करने का शरीर की सामान्य प्रणाली ठप्प हो जाती है; ऐसे में मस्तिष्क तथा मूत्राशय की मांसपेशियों में संदेशों का आदान प्रदान नहीं हो सकता।

एमएस वाले लोगों में मूत्राशय नियंत्रण में कुछ परेशानी होना सामान्य बात है। इसके चलते छींक या हंसी के बाद मूत्र की कुछ बूंदें निकल आना या पूरी तरह से नियंत्रण खो देना भी शामिल है। नियंत्रण के अभाव की परेशानी से निपटने के लिये समुचित कपड़े पहनना या पैडिंग तथा अन्य युक्तियां कारगर हो सकती हैं।

मेरूरज्जु के चोटिल होने के बाद मूत्राशय प्राय: एक या दो तरह से प्रभावित होता है : स्पैसटिक (रिफलेक्स) मूत्राशय वह स्थिति है जबकि आपके मूत्राशय में मूत्र भर जाये और रिफलेक्स स्वत: ही मूत्राशय को खाली करना शुरू कर दे। स्पैसटिक मूत्राशय की स्थिति सामान्यत: चोट के टी12 के स्तर से ऊपर होने पर आती है। स्पैसटिक मूत्राशय में आपको पता ही नहीं होता कि मूत्राशय कब खाली हो जायेगा।

फ्लेसिड या नन-रिफलेक्स मूत्राशय वह स्थिति है जब मूत्राशय मांसपेशियों के रिफलेक्स मंद या अनुपस्थित होते हैं। अगर आपको पता नहीं चलता कि मूत्राशय कब भर गया है यह अधिक प्रसार या खिंचाव भरा हो सकता है। मूत्र, मूत्रवाहिनी के माध्यम से वापस गुर्दों में जा सकता है जिसे अधोवाह कहते हैं। खिंचाव से मूत्राशय की मांसपेशियों पर भी असर पड़ता है।डायसेनर्जिया उस स्थिति में होता है जबकि मूत्राशय के संकुचन के समय स्फिंकटर मसल्स ढीली नहीं होती हैं। ऐसे में मूत्र मूत्रमार्ग के माध्यम से निकल नहीं पाता जिसके परिणाम में मूत्र वापस गुर्दों में जा सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि मूत्राशय पूरी तरह से खाली नहीं हो। स्फिंकटर को खोलने के लिये दवाओं के साथ साथ शल्य क्रिया का सहारा लिया जा सकता है।

मूत्राशय को खाली करने का सबसे सामान्य तरीका इंटरमिटेंट कैथेटराइजेशन (आईसीपी); इन्डवेलिंग केथेटर ( फोले); तथा पुरूषों के लिये बाह्य कांडोम केथेटर है।

मूत्राशय दुष्क्रिया के लिये कई शल्यक्रिया विकल्प हैं। मिटरोफेनआफ प्रक्रिया के तहत एपेंडिक्स का इस्तेमाल करते हुए मूत्र के लिये एक नये मार्ग का निर्माण किया जाता है। इसमें उदर के माध्यम से मूत्राशय तक केथेटराइजेशन करने की अनुमति मिलती है। यह महिलाओं सहित कई लोगों के लिये बहुत ही फायदे की स्थिति होती है।

मूत्रीय क्षेत्र संक्रमणलकवाग्रस्त लोगों में मूत्रीय क्षेत्र संक्रमण (यूटीआई) का भारी खतरा रहता है। संक्रमण का स्रोत जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु अति सूक्ष्म एकल कोशिकीय जीवन का एक रूप होते हैं जो समूह में रहते हैं और बीमारियों का कारण बन सकते हैं।त्वचा या मूत्रमार्ग से आईसीपी, फाले एवं मूत्राशय प्रबंधन की सुपरापबिक के साथ जीवाणु आसानी से मूत्राशय में आ सकते हैं। इसके अलावा अनेक लोग अपने मूत्राशय को पूरी तरह से खाली करने में सक्षम नहीं होते हैं; मूत्राशय में जमा रहने वाले मूत्र में भी जीवाणु पैदा हो सकते हैं।

यूटीआई के कुछ लक्षणों में बुखार, सरदर्द , नोसिया, सर्दी लगना तथा आटोनामिक डाइसरेफलेक्सिया (एडी) है। इसके अलावा आप पेशाब करते समय जलन महसूस कर सकते हैं या नीचे के श्रोणीय पेलविक एरिया, उदर तथा पीठ के निचले हिस्से में आराम नहीं होने की स्थिति महसूस कर सकते हैं।

यूटीआई से बचने की कुंजी मूत्राशय में जीवाणुओं के फैलने को रोकना है। मूत्रीय केयर आपूर्ति का उचित सफाई संक्रमण से बचा सकती है। मूत्र में तलछट को टयूब या कनेक्टर में लिया जा सकता है। इससे आपके मूत्र में निकासी के लिहाज से कड़ापन आता है और जीवाणुओं को फैलने में आसानी होती है। संक्रमण रोकने के लिये त्वचा की सफाई भी बहुत महत्वपूर्ण है।

उचित मात्रा में द्रव या पेय पदार्थों को पीना मूत्राशय से जीवाणुओं तथा अन्य बेकार उत्पादों को बाहर बहाने में मददगार हो सकता है। इससे यूटीआई से बचाव में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही यह मूत्रीय प्रणाली की अन्य परेशानियों की संभावना को कम करता है।इस लिहाज से कम से कम साल में एक बार पूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण की सलाह दी जाती है। इसमें यूरोलाजिक परीक्षण जिसमें गुर्दों के ठीक ढंग से काम करने की जांच के लिये अल्ट्रासाउंड या रेनल स्कैन भी शामिल है। इस परीक्षण में केयूबी, उदर का एक्सरे जिसमें गुर्दों या मूत्राशय में पत्थरी का पता चलता है।

यहां तक कि एक नियमित मूत्राशय प्रबंधन कार्यक्रम तथा उचित बचाव प्रणाली के बावजूद मूत्रीय क्षेत्र संक्रमण का खतरा बना रहता है। यूटीआई के लिये इलाज में चिकित्सक द्वारा सुझाया गया एंटीबायटिक दवा शामिल है।

मेरूरज्जु चोट वाले लोगों में मूत्राशय कैंसर का खतरा भी रहता है। अनुसंधानों से पता चलता है कि लंबे समय तक इंडवीलिंग कैथेटर का इस्तेमाल करने वालों में मूत्राशय कैंसर का खतरा बढ रहा है। इसके अलावा धूम्रपान से भी मूत्राशय कैंसर का खतरा बढता है।

स्रोत : नेशनल एम एस सोसायटी, स्पाइनल कोर्ड इंजरी इन्फोरमेशन नेटवर्क, यूनिवर्सिटी आव वाशिंगटन स्कूल आव मेडिसिन/ डिपार्टमेंट आव रिहेब्लीएशन मेडिसिन।

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