ट्रांसवर्स माइलाइटिस / Transverse Myelitis

अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ (ट्रांसवर्स माइलाइटिस; टीएम) तंत्रिकीय विकार है जो मेरुरज्जु के पूरे एक खंड में सूजन के कारण होता है। मेरुमज्जा शोथ (माइलाटिस) शब्द का आशय होता है मेरुरज्जु की सूजन या प्रदाह। अनुप्रस्थ (ट्रांसवर्स) शब्द मेरुरज्जु की पूरी चौड़ाई में सूजन था प्रदाह की स्थिति का बोध कराता है। प्रदाह के आक्रमण माइलिन को, क्षति पहुंचा सकते हैं या नष्ट कर सकते हैं, जो चर्बी युक्त पृथक्कारी पदार्थ होता है और तंत्रिका कोशिकाओं के तंतुओं को ढंके रहता है। यह क्षति तंत्रिका तंत्र को विक्षत करता है जिससे मेरुरज्जु और शरीर के शेष हिस्सों के बीच का संचार बाधित होता है।

कई घंटों से लेकर कई हफ्तों तक मेरुरज्जु का कामन करना टीएम के लक्षणों में शामिल है। अकस्मात् कमर दर्द या पेशीय कमज़ोरी या पैसे की उगंलियों और तलवों में असहज अनुभूति के रूप में शुरू होने वाले लक्षण बड़ी तेजी से बढ़कर लकवा, मूत्रीय अवरोधन, और आंत्रीय नियंत्रण के अभाव जैसे गंभीर लक्षणों का रूप ले लेते हैं।

कुछ लोग टीएम से पूरी तरह उबर जाते हैं और उनमें रोग की बहुत मामूली समस्याएं बची रह जाती हैं या बिलकुल भी कोई समस्या नहीं रह जाती। लकिन कुछ लोग स्थायी क्षति के शिकार हो जाते हैं जिससे उन्हें दैन्य दिन जीवन के सामान्य काम-काज करने की क्षमता प्रभावित होती है।

अमाइलिनीकरण की प्रक्रिया वक्षीय स्तर पर शुरू होती है और पैर चलाने और आंत और गूत्राशय के नियंत्रण में परेशानी होने लगती है, जिसके लिए मेरुरज्जु के हिस्से से संकेत की आवश्यकता होती है।

अनुप्रस्थ मेरुमज्जाशोध सभी नस्लों के आबाल वृद्ध नर-नारियों को होता है। किसी तरह की पारिवारिक पूर्वानुकूलता देखने में नहीं आती। हर साल 10 और 19 वर्ष और 30 और 39 वर्ष के लोगों में सबसे अधिक नये मामले सामने आते हैं। संयुक्त अमरीका में हर साल अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोध के लगभग 1400 नये रोगियों का पता चलता है, और लगभग 33,000 अमरीकी टीएम की वहज से पैदा हुई किसी-न-किसी तरह की विकलांगता से ग्रस्त हैं।

अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोध के कारणों की सही-सही जानकारी नहीं है। मेरुरज्जु को क्षतिपहुंचाने वाला प्रदाह विषाणु संक्रमण, असामान्य प्रतिरक्षी अभिक्रियाओं या मेरुरज्जु में उपस्थित रक्त वाहिनियों से अपर्याप्त रक्त संचार का नतीजा हो सकता है। अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ सिफिलिस, मीजल्स (खसरा), लाइम रोग और चेचक और रेबीज सहित कुछ टीकाकरणों की वजह से पैदा होने वाली पेचीदगियों का भी नतीजा हो सकता है।

विषाणु वाद

अनुप्रस्थ मेरुमज्जाशोथ प्रायः वेरिसेला जोस्टर (चेचक और शिंग्गेल्स [जनेऊ रोग] कारक विषाणु), हपीर्ज़ सिंप्लेक्स, साइटोमेगालो वाइरस, इप्सटीन बार, इंफ्लूएंज़ा, इकोवाइरस, ह्यूमन इम्यूनो डिफ़िसिए-सी वाइरस (एचआईवी), हीपेटाइटिस ए, या रूबेला-जैसे विषाणुओं के संक्रमणों, मध्य कर्ण के संक्रमणों, जीवाण्वीय न्यूमोनिया के साथ भी यह अवस्था जुड़ी हो

सकती है।

संक्रमण के बाद अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ होने के बारे में समझा जाता है कि शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली, जो सामान्यतः बाहरी सूक्ष्म जीवों से शरीर की रक्षा करती है, गलती से शरीर के अपने ऊतकों पर हमला कर देती है, जिससे सूजन आ जाती है और कुछ मामलों में मेरु रज्जु के भीतर के माइलिन को क्षति पहुंचाती है।

संक्रमण के बाद अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ होने के बारे में समझा जाता है कि शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली, जो सामान्यतः बाहरी सूक्ष्म जीवों से शरीर की रक्षा करती है, गलती से शरीर के अपने ऊतकों पर हमला कर देती है, जिससे सूजन आ जाती है और कुछ मामलों मे मेरुरज्जु के भीतर के माइलिन को क्षति पहुंचाती है।

अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ अतिपाती (कुछ घंटों या कुछ दिनों में विकसित होने वाले) या अवअतिपाती (एक-दो हफ़्ते में विकसित होने वाले) हो सकते हैं। अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ के चार क्लासकीय लक्षण उभर कर सामने आते हैं। (1) हाथ-पैरों में कमजोरी, (2) दर्द, (3) संवेदनात्मक परिवर्तन, (4) आंत और मूत्राशय की दुष्क्रिया। अधिकतर मरीज अपने पैरों में कमजोरी महसूस करते हैं, कुछ कम तो कुछ ज़्यादा; कुछ मरीज़ हाथों में भी कमज़ोरी महसूस करते हैं। कई हफ़्ते तक रोग बढ़ते जाने से पैर को पूरी तरह फ़ालिज मार जाता है। औऱ ह्वील चेयर की ज़रूरत पड़ने लगती है।

अनुप्रस्थ मेरूमज्जाशोथ के लगभग आधे मरीज़ों को दर्द होता है। दर्द कमर तक सीमित हो सकता है या तीखी चुभन जैसी अनुभूति हो सकती है जो पैरों या हाथों या पूरे धड़ में फैलता चला जाता है। अनुप्रस्थ मेरुमज्जाशोथ से पीड़ित 80 प्रतिशत मरीज कुछ हिस्सों में अतिसंवेदनशीलता की शिक़ायत करते हैं, इतनी संवेदनशीलता की कि कपड़ों या उंगली से छूने भर से काफ़ी कष्ट या दर्द होता है (इस स्थिति को एलोडाइनिया कहा जाता है)। कुछ मरीज तापमान परिवर्तन या चरम गर्मी या सर्दी के प्रति भी अति संवेदनशीलता की शिकायत करते हैं।

डाक्टर मरीज का चिकित्सकीय इतिहास पूछ कर और पूरे शरीर की तंत्रीकीय जांच करके अनुप्रस्थ मेरुमज्जाशोथ का निदान करते हैं।

इलाज

मेरु रज्जु की दूसरी विकृतियों की तरह अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ का फिलहाल कोई कारगर इलाज नहीं है। रोग के लक्षणों को नियंत्रित करने और कम करने की दृष्टि से इलाज तय किये जाते हैं। और बड़े पैमाने पर इलाज तय किये जाते हैं। और बड़े पैमाने पर इलाज इस पर निर्भर करता कि तंत्रिकाएं किस हद तक प्रभावित हैं। डाक्टर प्रायः सूजन कम करने के लिए पहले पांच हफ्तों के दौरान कर्टिकोस्टेरॉयड का नुस्ख़ा देते हैं।

शुरुआती इलाज के बाद का इलाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इस उम्मीद में कि तंत्रिका तंत्र स्वतः पूरी तरह या आशिंक रूप से ठीक हो जायेगा, मरीज के शरीर को सक्रिय रखना होता है। कभी-कभी इसके लिए मरीज को श्वांस यंत्र पर रखना पड़ता है।

अतिपाती लक्षणों-जैसे पक्षाघात के शिकार मरीजों का इलाज प्रायः अस्पताल में या पुनर्वास सुविधाओं में किया जाता है जहां विशेषज्ञ चिकित्सकीय दल पक्षाघात के मरीजों की समस्याओं की रोकथाम कर सकते हैं या उनका इलाज कर सकते हैं। आगे चलकर अगर हाथ-पैरों पर मरीज के नियंत्रण में सुधार आने लगता है तो पेशियों की ताक़त बढ़ाने, समायोजन और हाथ-पैरों की चाल का परास बढ़ाने के लिए भौतिकोपचार शुरू किया जाता है। अनुप्रस्थ मेरुमज्जा शोथ के मरीजों में आमतौर पर रोग के लक्षणों के सामने आने के 2 से 12 हफ़्तों में स्वास्थ्य लाभ शुरू हो जाता है। और दो साल तक चलता रह सकता है। बहरहाल, अगर मरीज की 6 महीने के भीतर हालत में सुधार आना नहीं शुरू होता तो उसके पर्याप्त स्वास्थ्य लाभ की संभावनाएं नहीं रहती। अनुप्रस्थ मेरुमज्जाशोथ के लगभग एक तिहाई मरीजों को काफ़ी आराम हो जाता है या वे पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। दूसरे एक तिहाई मरीजों की हालत में भी अच्छा सुधार आता है, महज स्तंभित चाल, संवेदनात्मक दुष्क्रिया और ज़ोर की पेशाब लगने या पेशाब न रोक पाने जैसी कमियां रह जाती हैं। शेष एक तिहाई मरीजों की हालत में कोई सुधार नहीं आता और उन्हें ह्वील चेयर का सहारा लेना पड़ता है और रोज़मर्रा के जीवन के काम-काज के लिए वे दूसरों पर आश्रित हो कर रह जाते हैं।

द नेशनल इंस्टीट्यूट आफ़ न्यूरोलॉजिकल डिसआर्डर ऐंड स्ट्रोक (एनआईएनडीएस) अनुप्रस्थ मेरुमज्जाशोथ और दूसरे स्वप्रतिरक्षी रोगों या विकारों में रोगप्रतिरक्षा प्रणाली की भूमिका के स्पष्टीकरण के लिए होने वाली शोधों को सहायता प्रदान करता है। संस्थान के अन्य काम कोशिका प्रत्यारोपण-जैसे उपायों की मदद से अवमाइलिनीकृत मेरुरज्जु की मरम्मत करने की रणनीति पर केंद्रित हैं। इन शोधों का अंतिम लक्ष्य इनसानों में उपयुक्त पुनरुद्धार और लकवाग्रस्त मरीजों के कामकाज को अक्षुण्ण रखने को प्रोत्साहन देना है।

स्रोतः नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ़ न्यूरोलोजिकल डिस्आर्डर्स ऐंड स्ट्रोक (एनआईएनडीएस), ट्रांसवर्स माइलाटिस असोसिएशन।

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